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क्या स्मार्टफोन हमारे युवाओं के बीच अवसाद में वृद्धि करने के लिए अग्रणी हैं?

स्मार्टफोन अब 25 वर्ष से कम उम्र की पीढ़ी के बीच सर्वव्यापक हैं। वे स्मार्टफोन के साथ इस हद तक जुड़े रहते हैं कि संभवतः उन्हें वह समय याद नहीं जब उनके पास स्मार्टफोन नहीं था या वे इसका उपयोग नहीं करते थे। स्मार्टफोन का अंगीकरण और उसका प्रयोग संचार का एक पहलू है जिसके बिना वे अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। फेसबुक, ट्विटर, इन्स्ताग्राम, स्नैपचैट, वाइन जैसे एप्स और पोकेमोन गो जैसे खेलों ने युवा स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं को लती बना दिया है। यही वह जगह है जहां हम खतरनाक इलाके से चलना शुरू करते हैं।

इलिनोय विश्वविद्यालय ने अमेरिका में अध्ययन के लिए 300 छात्रों का सर्वेक्षण किया और पाया कि स्मार्टफोन की लत और अत्यधिक उपयोग युवाओं के बीच व्यग्रता और अवसाद से जुड़ा हुआ है। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि जिन्होंने खुद को स्मार्टफोन और इंटरनेट ब्राउज़िंग का आदी माना हैं उनको व्यग्रता और अवसाद के पैमाने पर अधिक आंका गया है।

इससे पहले कि आप पेनिक बटन दबाएं, यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि ऊब कर स्मार्टफोन का उपयोग करना बनाम लगातार अपने फोन से चिपके रहना और इससे दूर होना पर पृथक्करण व्यग्रता से पीड़ित हो जाने के बीच के भेद को आप समझें। ऑनलाइन और दूसरों से जुड़े रहना भी प्रत्यक्षत: स्मार्टफोन की लत से जुड़ा हुआ है तो यह सिर्फ फोन का उपयोग करने के बारे में नहीं है।

यह आधुनिक युग की विडंबनाओं में से एक है कि सहस्त्राब्दि पीढ़ी में इतना जुड़ा होने के बावजूद, अक्सर पहले की तुलना में अधिक अकेलापन और मित्रहीनता महसूस करने की शिकायत रहती है। धारणा है कि वास्तविक जीवन में आपको मदद की जरूरत होने पर फेसबुक के सैकड़ों दोस्त होने के बजाय हमेशा बेहतर है कि एक दोस्त हो जिससे आप अपने दिल की बात कह सकते हों। तथ्य यह है कि प्रौद्योगिकी ने संपर्क में तो सक्षम कर दिया है, तथा हमारे ध्यान और करीबी लोगों के साथ समय बिताने को भी खंडित किया है। और यह इस हद तक है कि करीबी रिश्तों को बढ़ावा देने और बनाए रखने के लिए गुणवत्ता वाला समय लगाने में कमी आयी है। यह नकारात्मक भावनाओं से बचने या उबरने में हमें मदद करता था।

सोशल मीडिया के उपयोग में वृद्धि का परिणाम आत्म सम्मान कम करने के रूप में भी है। जैसे युवा इंस्टाग्राम फिल्टर और स्नैपचैट सेल्फी लेंस से अपने जीवन को देखते हैं। बिना असली दुनिया को जाने या वयस्क पर्यवेक्षण के अभाव के चलते वे खुद को कमतर मानने लगते हैं। आप इंटरनेट से क्या लेते हैं और यह आप को कितना प्रभावित करता है इसका आकलन कर पाना मुश्किल है। इससे भी बुरी बात यह है कि वयस्क मनोरंजन से लेकर ऑनलाइन धौंसियाने तक, वह सब कुछ जो स्मार्टफोन और इंटरनेट युग से पहले बच्चों की पहुँच से दूर रहती थी अब उनकी हथेलियों और जेबों में सुलभ रूप से उपलब्ध है।

इसका समाधान स्पष्ट रूप से यही है कि कम उम्र के लोगों का स्क्रीन समय विनियमित किया जाए। लेकिन यह तब और भी मदद करता है, यदि वयस्क खुद को भी स्मार्टफोन से अलग रहें और जिम्मेंदारी के साथ तकनीकी खपत का बेहतर उदाहरण पेश करें। परिवार और असली दोस्तों के साथ वास्तविक बातचीत करने से युवा बेहतर ढंग से संलग्न हो सकते हैं और वे क्या सोच या महसूस कर रहे हैं यह साझा कर सकते हैं। जाहिर है हम स्मार्टफोन से पहले की दुनिया में वापस नहीं जा सकते हैं, लेकिन हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हम उस युग में अपनाए गए जुडाव के कुछ स्वस्थ मूल्यों और काम की गुणवत्ता पर ध्यान बनाए रखने में चूक नहीं जाए।

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