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क्या प्रौढ़ नि:संतान दम्पतियों में अकेलेपन की भावना और अवसाद होने की सम्भावना अधिक होती है?

बुजुर्ग व्यक्तियों में अवसाद का असली कारण क्या है - आसपास लोगों की कमी, मनोरंजक कार्यों की कमी या मनोरंजक कार्यों को करने के लिए साथियों की कमी? अगर कमी सिर्फ किसी के साथ की है तो अच्छी संगति ही काफी है; और अगर करने के लिए मनोरंजक कार्यों की कमी हो तो केवल ऐसे काम ढूँढने है जिस में व्यक्ति का मन लगा रहे। लेकिन क्या ये सभी यहाँ पुछे गये सवाल का उत्तर है - क्या प्रौढ़ नि:संतान दम्पतियों में अकेलेपन की भावना और अवसाद होने की सम्भावना अधिक होती है?

नॉर्वे में की गई एक समीक्षा में देखा गया है कि हालांकि बच्चे के होने से शुरूआती समय में महिलाओं में सन्तुष्टी और आत्मसम्मान की भावना बढ़ती है, ऐसे परिवर्तन पुरूषों में नहीं आते हैं। प्रौढ़ अवस्था में नि:संतान दम्पतियों में अकेलापन या अवसाद बढ़ता हुआ नहीं पाया गया। लेकिन यह स्थिति हर देश में समान नहीं होता है क्योंकि कई देशों में लोग प्रौढ़ अवस्था में परिवार, दोस्तों और परिजनों पर निर्भरशील होते हैं, या उनके विचार उन सामाजिक विधियों से प्रभावित होते हैं जो प्रौढ़ अवस्था में दम्पतियों में अकेलेपन की भावना और अवसाद होने की सम्भावना को नि:संतान होने के साथ जोड़ता है। उस स्थिति में अकेलेपन और अवसाद का एक कारण संतान का न होना भी हो सकता है। लेकिन जिन देशों में वरिष्ठ नागरिको के लिए परिचर्या सेवायें उपलब्ध हैं वहाँ उनकी स्थिति बेहतर रहती है।

पहले के ज़मानें में बच्चों के न होने से जीवन को अधूरा समझा जाता था – ऐसा जीवन जिसका कोई उद्देश्य नहीं होता; अपने नाती-नतनी, पोता-पोतियों को नहीं देख पाना – एक निराशाजनक अंत। लेकिन अध्ययन में बताया गया है कि संतानवाले और नि:संतान बुजुर्गों में खुशहाली के दर में बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है।

The dangers of suppressed anger

 ओर्ना डोनाथ, जो इजराइल में रहनेवाली एक समाजशास्त्री हैं और जो अपनी इच्छा से नि:संतान रहीं, उन्होंने 20 ऐसी महिलाओं के साक्षात्कार लिये जिन्हें अपने माँ बनने के निर्णय पर अफसोस था। उन्होंने अपनी खोज को प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने कहा कि माँ बनने का अनुभव सुखद, प्यार भरा, गौरवशाली और संतुष्टिपूर्ण तो होता है लेकिन साथ साथ उन महिलाओं ने असहायता, लाचारी, हताशा और परतंत्रता जैसी भावनाओं को भी महसूस किया। जिन महिलाओं से उन्होंने बात की थी, वे सभी चाहती थी कि वे मातृत्व की स्थिति को पलट दें, और डोनाथ ने बिना उनकी भावनाओं को सही या गलत बताये, इन कहानियों को मातृत्व का अनजाना अनुभव बताया।

इस प्रेक्षापट में यह कहना उचित होगा कि कुछ लोगों के लिए शुरू में नि:संतान होने की भावना हताशापूर्ण और विफलता का प्रतीक होता है, और इनमें से कुछ व्यक्ति आजीवन इस बात का अफ़सोस मनाते हैं, लेकिन अधिकतर लोगों का दु:ख समय के साथ समाप्त हो जाता है। किसी से जुड़े रहना, आत्म-संतुष्टि और जीवन का उद्देश्य ढूँढने से उनके जीवन का मान सुधरता है, और “बच्चों के बिना बूढ़ापा लगे सुना” कहावत को मिथक बना देता है।

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