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क्या वरिष्ठ नागरिकों में शारीरिक विकलांगता या चलने फिरने की समस्या अवसाद का कारण हो सकता है?

एक चुटकुला है कि अगर 60 की आयु के बाद आप शरीर के किसी भी भाग में दर्द महसूस नहीं करते हैं तो हो सकता है कि आप जीवित नहीं हो। इसका तात्पर्य यह है कि बढ़ती उम्र के साथ हमारी हड्डियाँ और मांसपेशियाँ कमज़ोर होने लगती हैं, जिसकी वजह से गिर जाना या हड्डी का टूट जाना आम बात हो जाती है। एक अन्तराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक 65 या उससे ज़्यादा आयु के लोगों में 87% लोगों की गिरने की वजह से हड्डी टूटी है। ज़्यादा संख्यक लोगों की चलने फिरने की गति इसी कारण से उम्र बढ़ने के साथ साथ धीमी हो जाती है।

बढ़ती उम्र की निशानियाँ – शारीरिक तकलीफ़े हमारी चाल को नियंत्रित करने लगती है। जांघ की हड्डी से लेकर चपनी के प्रतिस्थापन तक बढ़ती उम्र की हर समस्या का चिकित्सकीय समाधान अब उपलब्ध है लेकिन इस बात कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि इन चिकित्साओं से वरिष्ठ नागरिक दोबारा दौड़ भाग करने में सक्षम होंगे। सच तो यह है कि हर चोट या शल्यचिकित्सा या गिरने के प्रकरण के बाद उन्हें लाठी, वॉकर या व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है। धीरे धीरे सुबह टहलने जाने में भी डर लगने लगता है।

शोधकर्ताओं ने जाना है कि शारीरिक कसरत की कमी, मोटापा, ताकत और तालमेल की कमी, और मधुमेह और गठिया जैसे कारणों से वरिष्ठ नागरिकों में गतिशीलता की कमी हो जाती है। इसका प्रभाव समाज, मन और शरीर पर पड़ता है। हालांकि उनके परिवारवाले या देखभाल करने वाले उन्हें ज़्यादा चलने फिरने नहीं देना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गिरने और चोट लगने का डर लगा रहता है, लेकिन इसके परिणाम हमेशा अच्छे नहीं होते हैं।

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सबसे पहले उनके चलने फिरने की आज़ादी समाप्त हो जाती है जो उनके हौसले को तोड़ देता है। ज़्यादातर वरिष्ठ नागरिक आत्मनिर्भर और स्वतंत्र रहना चाहते हैं। किसी यंत्र या दूसरे व्यक्ति पर छोटी छोटी बातों के लिए निर्भर करने से उनकी दोबारा चलने फिरने की क्षमता समाप्त होने लगती हैं। बाहर न जा पाना और हमेशा घर पर या एक जगह बैठे रहने से वे ज़्यादा चिंता करने लगते हैं, अवसादकारी बातें सोचते रहते हैं, और उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है। यह उन्हें डीमेन्शिया या अवसाद की तरफ ले जाती है।

दूसरी बात यह कि उनका सामाजिक मेल मिलाप सुबह या शाम के सैर के साथ या अपने पसंदीदा कामों को करने के साथ जुड़ा होता है। जब यह सब उनसे ले लिया जाता है तब उनकी सामाजिक गतिविधि समाप्त हो जाती है। जितना ज़्यादा आप उनको घर में सबसे अलग रखेंगे, उतना ही डीमेन्शिया या अवसाद होने की सम्भावना बढ़ जाती है। हम सब जानते हैं कि किसी भी नई चीज़ – नया काम या सामाजिक मेलजोल, हमारे दिमाग की कार्यक्षमता को बढ़ाती है। सामाजिक मेलजोल की कमी या अकेलापन पूर्ण अवसाद का रूप ले सकती है अगर वरिष्ठ जनों को लम्बे समय तक बिना सामाजिक संगति के एक छोटी सी जगह में रहने को कहा जाए।

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वरिष्ठ नागरिकों को एक जगह कैद करके रखने के बजाय चलने फिरने में उनकी मदद करनी चाहिए। यह उन पर भी लागू होता है जो विकलांग हैं। अगर कमज़ोर हड्डियों या उनके टूटने के कारण चलने फिरने में बाधा उतपन्न होती है तो फिजियोथैरेपी और पौष्टिक तत्वों की मदद ली जा सकती है। कभी कभी उनको दोबारा गतिशील बनाने की आपकी कोशिश ही उनके लिए दवा का काम करती है। उनका हौसला बढ़ाना आपका कर्तव्य है। इससे ही आप उनको अवसाद जैसी समस्या से दूर रख पायेंगे।

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