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किशोरों में आत्म-हानि की प्रवृत्ति

युवाओं में अपनी भावनात्मक संकटों से निपटने के लिए स्वयं को क्षति पहुँचाने वाले व्यवहार का सहारा लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है

16 साल की संगीता पढ़ाई में हमेशा से तेज़ थी लेकिन कुछ समय से उसका शैक्षिक प्रदर्शन खराब होने लगा था। उसकी विज्ञान की शिक्षिका ने इस बात पर गौर किया और यह भी कि संगीता गुमसुम रहने लगी थी। उन्हें यह बात अजीब लग रही थी कि दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी में संगीता पूरी बाँह के कपड़े पहन रही थी। क्लास के बाद शिक्षिका संगीता को अपने केबिन में ले गईं और उससे हल्के से पूछा कि क्या चल रहा था। संगीता रोने लगी और उसने अपने माता पिता के बीच चल रहे तनाव के बारे में बताया। पूछताछ के बाद शिक्षिका को पता चला कि संगीता अपनी ऊपरी बाँह को ब्लेड से काट रही थी।

परिस्थिति को समझाने के लिए वास्तविक जीवन घटना के आधार पर इस काल्पनिक कथा का निर्माण किया गया है।

हम सभी ने ऐसे युवाओं के बारे में पढ़ा है जो स्वयं को काटकर, जलाकर या इसी तरह के अन्य क्षतिकर व्यवहार से अपनेआप को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं। इसे गैर-आत्मघाती आत्म-हानिकारक व्यवहार कहा जाता है, और यह प्रवृत्ति 14-15 साल के किशोरवय और नवीन वयस्कों में पाया जाता है। यह देखभाल करनेवालों और विशेषज्ञों के लिए चुनौतीपूर्ण व्यवहार है क्योंकि इसे भापना मुश्किल होता है।

जिन लोगों में गैर-आत्मघाती आत्म-हानिकारक व्यवहार देखा जाता है, वे यह नहीं मानते है कि वे आत्मघात के बारे में सोचते हैं। इस व्यवहार की जड़ मानसिक पीड़ा और नकारात्मक भावनाओं से निपटने की असमर्थता होती है। सामान्य रूप से इसका कारण क्रोध या अवसाद जैसी नकारात्मक भावनाएं होती हैं, लेकिन कभी कभी यह कई भावनाओं की एकत्रीकरण से पनपता है। उन्हें लगता हैं कि ऐसा करने से वे अपनी भावनाओं के साथ बेहतर तरीके से निपट सकते है।

सबसे आम धारणा यह है कि जो लोग स्वयं को क्षति पहुँचाते हैं वे ऐसा अपने ऊपर ध्यान आकर्षित करने या दूसरों की भावनाओं के साथ खेलने के लिए करते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। लोग अपने को क्षति पहुँचाते हैं क्योंकि:

लेकिन यह याद रखना भी जरूरी है कि आत्म-हानिकारक व्यवहार एक जटिल समस्या है, जो विविध कारणों से होता है। हर व्यक्ति के कारण अनोखे (और एकाधिक) होते है और सबसे जरूरी यह है कि विपत्ति की घड़ी में व्यक्ति के साथ संवेदनशील व्यवहार किया जाये।

परिवेश और व्यवहारिक कारकों की भूमिका

ऐसा देखा गया है कि वे व्यक्ति जो अपने आपको काटते या जलाते हैं, उनका बचपन प्रतिकूलता में बिता था। इनमें शारीरिक और यौन दुर्व्यवहार, धौंस का शिकार होना, घर पर वैवाहिक विवाद या घरेलू हिंसा, और कभी-कभी उनके यौन अभिविन्यास से संबंधित मुद्दों शामिल हैं। पूर्णतावादी रवैया वाले युवाओं में भी ऐसा व्यवहार देखा जा सकता है, जो खुद को दंडित करने के लिए इसका सहारा लेते हैं। मानसिक पीड़ा का कारण जो भी हो, उस व्यक्ति को जरूरत होती है एक संवेदनशील और समझदार दोस्त की जो निष्पक्ष हो।

किन लक्ष्णों पर ध्यान देना चाहिए?

जो लोग स्वयं को काटते या जलाते है वे अपनी इन आदतों को गोपनीय रखते हैं, इसीलिए परिवारवालों या दोस्तों को इसके बारे में आसानी से पता नहीं चलता। लेकिन कुछ ऐसे प्रारंभिक व्यवहारिक लक्षण होते हैं जिनसे यह पता चल सकता है कि किशोर अपने को नुकसान पहुँचा रहा है। अगर कोई बार बार पट्टी बांधकर घुमता हुआ पाया जाता है तो आप उससे पट्टी बांधने का कारण पूछ सकते हैं। अगर उसका बताया गया कारण आपको संदेहपूर्ण लगे तो हो सकता है कि वह अपने को चोट पहुँचा रहा है। ज्यादातर लोग बाँहों को क्षति पहुँचाते है और निशान छुपाने के लिए लम्बी बाँह वाले कपड़े पहनते हैं। यह समझते हुए दूसरों की दृष्टि से बचने के लिए कुछ लोग जांघ या ऐसी जगहों को काटते या जलाते है जो आसानी से नज़र नहीं आते। अगर बच्चे स्वयं को बार बार कमरे में बंद कर ले रहें हैं, तब हो सकता है कि वे अपने साथ ऐसा कर रहें हो।

टिप्पणी: ऊपर सूचीबद्ध व्यवहारिक लक्षण सांकेतिक हैं लेकिन केवल व्यवहार से यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि व्यक्ति स्वयं को क्षति पहुँचा रहा है। वे केवल यह इंगित करते हैं कि इस समस्या का पता लगाना कितना मुश्किल हो सकता है।

आत्म-हानिकारक व्यवहार का निदान कैसे किया जाता है?

इस तरह के व्यवहार के इलाज की कोई एकल विधि नहीं है। सर्वप्रथम यह समझने की जरूरत होती है कि किस तरह की समस्याओं से व्यक्ति जुझ रहा है जिससे निजात पाने के लिए वह स्वयं को क्षति पहुँचा रहा है। अगर ऐसा व्यवहार व्यग्रता या अवसाद जैसी किसी अन्य मानसिक समस्या से उत्पन्न होता है तब उन समस्याओं का निदान भी महत्वपूर्ण होता है। थेरपी के साथ साथ दवाइयों की भी जरूरत हो सकती है। संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (सीबीटी) और सचेतनता प्रणाली ( माइंडफुलनेस थेरपी) ऐसी चिकित्सा पद्धतियां हैं जिनके सहारे व्यक्ति अपने अस्वास्थ्यकर विचारों को पहचानकर, सकारात्मक और स्वस्थ विचारों के साथ प्रतिस्थापित करते हैं। कुछ मामलों में, परिवार में अशांति मानसिक पीड़ा का कारण हो सकती है; इस स्थिति में अंतर्निहित मुद्दों को हल करने के लिए पारिवारिक थेरपी से मदद मिल सकती है।

अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते है जो स्वयं को नुकसान पहुँचा रहा है तो आपको क्या करना चाहिए?

स्वयं को क्षति पहुँचाना एक अति संवेदनशील परिस्थिति है और इसलिए इस मुद्दे पर सावधानी से बात करनी चाहिए। इस समस्या को घेरे हुए जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है लोगों में गलतफहमी और जागरूकता की कमी। इस समस्या के बारे में सही ज्ञान प्राप्त करना और स्थिति के साथ संवेदनशील तरीके से पेश आना आवश्यक है। जो लोग खुद को काटते या जलाते हैं उन्हें जरूरत होती है ऐसे किसी व्यक्ति की जो उनकी बातें धैर्यपूर्वक सुने; और जो पक्षपाती बनने के बजाय उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करता है। अगर आपको यह नहीं समझ आ रहा है कि आप इस परिस्थिति से कैसे निपटे तो आप किसी ऐसे मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से बात कर सकते हैं जो आत्म-हानिकारक व्यवहार के क्षेत्र में विशेषज्ञ हो।

यह आलेख निमहांस में नैदानिक मनोविज्ञान की सहयोगी प्रोफेसर डॉ पूर्णिमा भोला से प्राप्त तथ्यों के आधार पर लिखा गया है।

इस आलेख की सर्वप्रथम रचना और प्रकाशना व्हाइट स्वान फाउंडेशन द्वारा की गई थी, और इसे द लिव लव लॉफ फाउंडेशन के लिए संपादित किया गया है।

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