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आत्महत्या हमारी भी समस्या है

डॉ जी गुरूराज

हाल के वर्षों में मृत्यु, अस्पताल में भर्ती मरीज़ों की संख्या, और सामाजिक एवं आर्थिक नुकसान के चलते आत्महत्या भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभरकर आयी है। आत्महत्याएं, आत्महत्या का प्रयास और आत्मघाती विचारधारा / व्यवहार भारत के हर क्षेत्र में देखा जाता है, भले ही संख्या अलग-अलग स्थानों में भिन्न हो।

इसीलिए आत्महत्या की रोकथाम का दायित्व केवल चिकित्साविज्ञान से जुडे लोगों और सरकार पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर है।

लेकिन इससे पहले, हमें इस समस्या की भयावहता को समझना होगा। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी), गृह मंत्रालय, भारत सरकार के आधिकारिक रिपोर्टों के मुताबिक वर्ष 2013 में 1, 34, 799 व्यक्तियों की आत्महत्या की। भारत में आत्महत्या के आकड़ों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है; 1980 में 40,000 से बढकर 2013 में यह 1,35,000 हो गई है। आत्महत्या का सालाना राष्ट्रीय दर 100,000 आबादी प्रति 11 है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा किये गये स्वतंत्र अनुसंधान अध्ययनों से पता चलता है कि गलत रिपोर्टिंग के कारण आधिकारिक आत्महत्या की संख्या समस्या को कमतर बताती हैं।

आत्मघाती व्यवहार या विचारधारा वाले लोगों की संख्या केवल एक अनुमान है क्योंकि इस समस्या का आकलन करने के लिए भारत में बड़े पैमाने पर जनसंख्या आधारित अध्ययन नहीं किए गए हैं। यह ज्वलंत मुद्दा कि ‘लोग आत्महत्या या उसका प्रयास क्यों करते हैं’ एक जटिल प्रश्न है। आधिकारिक रिपोर्टों से पता चलता है कि 15.6 प्रतिशत आत्महत्याओं में कारणों का पता ही नहीं चलता है। पारिवारिक समस्याएं, बीमारी, आर्थिक कारक, दहेज सम्बंन्धित मौत जैसे सामान्य और अस्पष्ट कारणों का उल्लेख किया जाता है, लेकिन यह विशिष्ट और लक्षित हस्तक्षेप का आधार नहीं बनते हैं।

शराब की लत, घरेलू हिंसा, तीव्र संकट की स्थिति और अवसाद जैसे मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं वे कारक हैं जिनका प्रभाव इस सूची पर पड़ता है। इसके अलावा, संकट की स्थिति में परिवार, मित्रों और सामाजिक सहयोग की कमी भी अंशदायी कारक हैं। दुनिया भर के कई संगठनों द्वारा लम्बे अर्से से किये जा रहे अनुसंधानो से पता चला है कि आत्महत्याएं सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी कारकों के जटिल और पारस्परिक संघर्ष का परिणाम हैं, और अक्सर व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक जोखिम कारकों की मौजूदगी से अग्रसर होता हैं।

यह अंतर्द्वंद व्यक्ति को निराशा और मूल्यहीनता का बोध करवाता है, और अंततः आत्मघाती कृत्यों तक ले जाता है।

आत्महत्या के कारणों पर बहस तो चल ही रही है; लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि सही प्रकार के समर्थन और हस्तक्षेप से आत्महत्याओं को रोका जा सकता है।

कुछ बड़े हस्तक्षेपों ने आत्महत्या की रोकथाम में काफी योगदान दिया है। इसमें शामिल हैं कीटनाशकों और दवाओं की आसान उपलब्धता पर रोक, आत्महत्या का प्रयास करनेवाले व्यक्तियों को समय पर और उचित चिकित्सा उपलब्ध करवाना, मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों और आत्महत्या हेल्पलाइन को पहुंच के अंदर लाना, आत्मघाती व्यवहार का प्रारम्भिक स्तर पर आकलन और समय का उचित प्रबंधन। शैक्षिक संस्थानों, कार्यस्थलों और समुदायों में सार्वजनिक जागरूकता कार्यक्रमों की मदद से शुरूआती दौर में ही समस्या की पहचान कर पाना सम्भव हो सकता है; साथ ही कलंक की भावना और ऐसे अन्य मुद्दों पर भी रोशनी डाली जा सकती है।

निस्संदेह, मुश्किल परिस्थितियों का सामना कैसे किया जाना चाहिए, इस विषय पर उच्चतर मीडिया रिपोर्टिंग प्रथाएं मददगार साबित हुई हैं। सार्वजनिक भागीदारी के साथ आत्महत्या रोकथाम की नीतियों और कार्यक्रमों के संमिश्रण से कठिन परिस्थितियों में अपने जीवन को स्वेच्छा से समाप्त करने की इस बढ़ती प्रवृत्ति को बदलना संभव है।

डॉ जी गुरुराज निमहांस में महामारी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और महाप्रबंधक हैं।

इस आलेख की सर्वप्रथम रचना और प्रकाशना व्हाइट स्वान फाउंडेशन द्वारा की गई थी, और इसे द लिव लव लॉफ फाउंडेशन के लिए संपादित किया गया है।

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