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ब्लू व्हेल चैलेंज:

माता-पिता, देखभाल करने वालों और युवाओं को क्या जानने की जरूरत है

चेतावनी: इस लेख में ऐसी जानकारी हो सकती है जो कुछ लोगों में व्यग्रता और चिंता की भावना पैदा कर सकती है।

10 जुलाई 2017 को अंधेरी मुम्बई के एक 14 वर्षीय लडके से अपने बहुमंजिली घर की छत से कूदकर जान दे दी। रिपोर्टों के अनुसार उसके पडोसीयों से उसे छत के कोने पे खडा देखा था। वे उसकी तरफ दौडे लेकिन इससे पहले कि वे उस तक पहुँच पाते, वह कूद चुका था। उसकी मौत को लेकर बहुत तरह की अफवाहें फैली हुई हैं, लेकिन मुम्बई पुलिस का मानना है कि ब्लू व्हेल नाम की एक आनलाइन गेम से जुडा यह भारत में आत्महत्या का पहला मामला है। तब से लेकर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और केरल में इससे मिलते जुलते कई मामले घट चुके हैं।

गेम के विषय में

ब्लू व्हेल एक इंटरनेट गेम है जिसकी शुरूआत रूस में हुई। यह फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे आनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर “खेला” जाता है। खेल के आविष्कारक फिलिप बुदेकिन ने इसे बनाया क्योंकि वह “कमजोर दिमाग वालों को मिटाकर समाज को शुद्ध करना चाहता था।” इस खेल के प्रतिभागी दूसरों से कटा हुआ, एकाकित्व और निराशा महसूस करने लगते हैं। इसमें 50 दिनों तक “खिलाड़ियों” के लिए निर्दिष्ट कार्यों की श्रृंखला होती है। प्रत्येक कार्य पिछले कार्य की तुलना में अधिक तीव्र और हानिकारक होता है, और अंतिम कार्य आत्महत्या है। अन्य कार्यों में आत्म-क्षति, बेढंगे समय पर नींद से जागना, डरावने वीडियो या फिल्मों देखना आदि शामिल है।

हमें क्यों इसे लेकर बात करनी चाहिए?

यह गेम भारत के इंटरनेट क्षेत्र में फैल रहा है, और इससे जुड़े मामले सामने आ रहे हैं। भारतीय सरकार और सोशल मीडिया सेवाएं इसके बढ़ते कदमों को रोकने का भरसक प्रयास कर रहें हैं। लेकिन साथ ही यह समझने की भी जरूरत है कि कौन इस गेम को खेलने के जोखिमक्षेत्र में सकता है और क्यों; साथ ही जो इसे खेल रहा है उसमें क्या लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

किस तरह के लोग इस खेल को खेलने के प्रति आकर्षित होते हैं और क्यों?

आनलाइन चेट रूम्स और खेलों के बढ़ते चलन के साथ नई पीढी इंटरनेट को एक दूसरे के साथ सम्पर्क बनाए रखने के लिए अधिक इस्तेमाल कर रही है। बच्चे आजकल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कम आयु से ही करने लगे हैं। कौतुहल और जिज्ञासा का बढ़ना अच्छा है लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है, क्योंकि ज्ञान का गलत अर्थ निकाला जा सकता है और इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। डॉ राम्या मोहन, वरिष्ठ सलाहकार बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा और आई मानस, लंदन की मेडिकल निदेशक, ने कहा कि मुम्बई में अपने घर की छत से कूदने वाले मनप्रीत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था । “उसके मां-बाप डरे हुए थे। उन्होंने पहले ही बताया थी कि मनप्रीत को कोडिंग करना और कम्प्यूटर पर गेम्स खलना पसंद था। कभी कभी बच्चों को उनकी प्रौद्योगिकी दक्षता और जिज्ञासा के लिए निशाना बनाया जाता है।”

अन्ना चण्डी, टीए विश्लेषक और द लिव लव लाफ फाउंडेशन की चेयर पर्सन ने उल्लेख किया कि जो लोग ऐसे गेम्स खेलते हैं उनके अंदर मान्यता प्राप्त करने की चाहत होती है। “यह एक अस्तित्वपरक, मौलिक आवश्यकता है। हम सभी बूढ़े और जवान नए रास्ते तलाश रहे हैं, और सोशल मीडिया इसे हासिल करने के लिए एक माध्यम बन गया है।” समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम सकारात्मक और नकारात्मक स्रोतों के बीच अंतर नहीं कर पाते हैं। “समाज युवाओं को कम आयु से प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, लेकिन यह उम्र और संदर्भ के उपयुक्त है या नहीं इस जानकारी का मूल्यांकन किए बिना। बच्चे इसीलिए मान्यता प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, बिना आंकलन किये कि इसका स्रोत क्या है और आगे चलकर में इसका प्रभाव क्या हो सकता है।”

मनोचिकित्सक और लिव लव लाफ फाउंडेशन के ट्रस्टी डॉ श्याम भट के विचार भी कुछ ऐसे ही हैं। वह और बताते है कि स्वयं के प्रति नकारात्मक भाव रखनेवाले, लम्बे अर्से से अकेलेपन को मारे और बचपन में शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार झेल चुके लोग, इस तरह के खेलों में खुद को शामिल करने की अधिक संभावना रखते हैं। चूंकि इनमें से कुछ बच्चें अपने साथियों या प्रियजनों से जुड़ाव महसूस नहीं करते हैं, इसलिए वे “आकर्षित होते हैं क्योंकि यहां उन्हें एकता और समुदाय से जुड़े होने का झूठा दिलासा मिलता है”। उनके लिए किसी दल या वर्ग का हिस्सा बन पाना उसके नकारात्मक परिणामों से ज़्यादा प्रभावशाली बन जाता है।

किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?

अत्यधिक सोशल मीडिया का उपयोग:

क्योंकि यह गेम आनलाइन पोर्टलों और सोशल मीडिया के माध्यम से खेला जाता है, जो बहुत ज़्यादा इंटरनेट का प्रयोग करते है, उन किशोरों के इस गेम के संपर्क में आने की सम्भावना बढ़ जाती है। इसी तरह से पश्चिम बंगाल के 10वी कक्षा के छात्र अंकन दे को यह गेम मिला था।

गेम का उल्लेख करना या इसे खेलने की इच्छा जताना:

मनप्रीत, मनोज, अंकन सभी ने बिते समय में इस गेम का उल्लेख अपने दोस्तों और परिवारजनों के सामने किया था। कुछ बच्चे इसे खेलने की इच्छा भी जता सकते हैं।

व्यवहार में अचानक और संगीन परिवर्तन:

बच्चे जो आमतौर पर सामाजिक मेलजोल रखनेवाले और उर्जावान होते है, उनका बर्ताव बदल जाता है। मनोज को अकेले घुमने जाना पसंद नहीं था लेकिन गेम खेलना शुरू करने के बाद वह कब्रिस्तान और समुद्र तटों पर अकेले जाने लगा था।

आत्मघाती विचारों या आत्महानि की कोशिश को व्यक्त करना

भारत में हुए 5 में से 3 मामलों में बच्चों ने आत्मघाती विचारों का जिक्र अपने दोस्तों और परिवार से किया था।

आत्म-क्षति

इस खेल को दुनिया-भर में आत्म-क्षति के मामलों में हुई वृद्धि से जोड़ा जा रहा है, क्योंकि कुछ कार्यों में प्रतिभागी को अपने हाथ पर नीले व्हेल की नक्काशी नुकीले वस्तु से करनी होती है।

आत्मसम्मान की कमी और असामाजिक व्यवहार

जिन बच्चों में आत्मसम्मान की कमी होती है वे ऐसे आनलाइन खेल घण्टों खेल सकते है। दूसरी ओर कुछ बच्चों में इस गेम के चलते आत्मसम्मान की कमी और असामाजिक व्यवहार पनप सकता है क्योंकि इस गेम के कार्यों को करने के लिए उन्हें अपने आप को दूसरों से दूर कर लेना पड़ता है।

हम कैसे मदद कर सकते हैं?

डॉ राम्या कहती हैं कि “माता–पिता को अपने बच्चों के साथ वार्तालाप का मार्ग हमेशा खुला रखना चाहिए”। विश्वास का वातावरण बनाना बहुत महत्वपूर्ण है। “अगर स्कूल या दोस्तों को लेकर आपके बच्चे के मन में कुछ चल रहा है तो आपके साथ उसका रिश्ता इतना मजबूत होना चाहिए कि वह आपसे अपने मन की बात साझा कर सके।” इस तरह से आप जान सकते है कि वह या उसके दोस्त इस गेम को खेलना चाह रहें हैं या नहीं।

“माता-पिता को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे अपने बच्चे के इंटरनेट उपयोग और तौर-तरीकों के बारे में पूरी जानकारी रखें”
– डॉ राम्या

डॉ श्याम यह भी सुझाव देते हैं कि माता-पिता को जानकारी होनी चाहिए कि उनके बच्चे इंटरनेट और सोशल मीडिया का किस तरह से उपयोग कर रहें है, और इंटरनेट पर बिताये जानेवाले समय की मात्रा और उनके द्वारा देखे जा रहे साइट्स पर ध्यान दें।

डॉ राम्या कहती हैं कि एक संगठनात्मक परिप्रेक्ष्य से, स्कूल और कॉलेज यह सुनिश्चित करें कि वे आसपास की दुनिया में चल रहें मुद्दों से अवगत है। “स्कूलों में चेतावनी संकेत लगाये जाने चाहिए और ऐसे माहौल को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जिसमें बच्चे बात करने में सुरक्षित महसूस करें, बिना किसी भय के।”

यदि आप उदास महसूस कर रहे हैं और / या आपके मन में आत्मघाती या स्वंय को चोट पहुंचाने के विचार आ रहे हैं, तो मान्यता प्राप्त करने के लिए या जुड़ाव महसूस करने के लिए इस गेम को न खेलें। जानिए कि किसी से जुड़ने के अन्य स्वस्थ तरीके हैं। ध्यान रखें कि यह खेल अंत की ओर ले जाता है और आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक है।

इसके अतिरिक्त, अपने मित्रों और सामाजिक समूहों पर ध्यान दें – अगर आपके जाननेवालों में से कोई इस खेल को खेल रहा है या इसे खेलने का विचार कर रहा है, तो उसे हल्के ढंग से न लें। यह सुनिश्चित करें कि आपका मित्र / सहकर्मी / या बच्चे को तुरंत मदद प्राप्त हो।

यदि आप किसी पेशेवर से बात करना चाहते हैं, तो तुरंत हमारे साथी हेल्पलाइनों से सम्पर्क करें:

आसरा: 022-27546669 । आई कॉल: 022-25521111 । सहाय: 080-25497777 । स्नेहा: 044-24640050

डॉ राम्या मोहन एक वरिष्ठ सलाहकार है बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा विभाग में और आई मानस, लंदन की मेडिकल निदेशक हैं।

डॉ श्याम भट मनोचिकित्सक हैं और द लिव लव लाफ फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं।

अन्ना चण्डी एक टीए विशेषज्ञ हैं और द लिव लव लाफ फाउंडेशन की चेयर पर्सन हैं।

Sources

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