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किशोरों के लिये जीवन कौशल का महत्व

अपनी समस्याओं से निपटने और भावी चुनौतियों के लिए तैयार रहने के लिए किशोरों में संज्ञानात्मक और सामाजिक कौशल के संयोजन की आवश्यकता होती है

डॉ गरिमा श्रीवास्तव

किशोरावस्था एक महत्वपूर्ण प्रगति और विकास की अवस्था है, जिसमें बचपन से वयस्क होने की यात्रा तय की जाती है। इसमें तेजी से होनेवाले मानसिक और शारीरिक परिपक्वता के लक्षण दिखाई देते हैं। इस स्थिति से कुछ किशोर निपुणता से जुझ सकते हैं, और कुछ के लिए यह एक संघर्षपूर्ण समय होता है। एक किशोर इस स्थिति का सामना कैसे करता है यह निर्धारित होता है कई तत्वों के आधार पर जिनमें शामिल है उसका व्यक्तित्व, परिवेश (जैसे अभिभावक, शिक्षक और दोस्तों) से उपलब्ध मानसिक और सामाजिक सहयोग, और उसका अपना जीवन कौशल।

जीवन कौशल “अनुकूल और सकारात्मक व्यवहार के लिए वे क्षमताएं हैं जो व्यक्तियों को दैनिक जीवन की मांगों और चुनौतियों का उचित तरीके से सामना करने के लिए उपयुक्त बनाता है” (डब्ल्यूएचओ)। यह एक प्रभावी उपकरण हैं जो युवाओं को जिम्मेदारी से काम करने, पहल लेने और नियंत्रण लेने के लिए सशक्त बनाता है। यह इस धारणा पर आधारित है कि जब युवा अपने जीवन के कठिन परिस्थितियों से उबरने में सक्षम होते हैं, तब वे असामाजिक या उच्च जोखिम वाले व्यवहारों का सहारा कम लेते हैं।

डब्ल्यूएचओ द्वारा दी गई 10 प्रमुख कौशलों की सूची:

आत्म जागृति

इसमें शामिल है स्वयं की पहचान, अपना चरित्र, अपनी क्षमताएं और कमियां, इच्छाएं और नापसंदी। आत्म जागृत किशोर यह पहचान सकते हैं कि वे कब तनाव के प्रभाव में होते हैं और कब उन्हें दबाव महसूस होता है। आत्म जागरण सामान्य रुप से प्रभावी संवाद और सही अन्तर्वैयक्तिक संबंधों के चलते होता है और इससे दूसरों के प्रति समानुभूति भी विकसित होती है।

समानुभूति

यदि हम अपने प्रियजनों और समाज के साथ सफल संबंध बनाना चाहते हैं, तब यह महत्वपूर्ण है कि हमें अपनी किशोरावस्था में, अन्य व्यक्तियों की जरूरतों, इच्छाएं और संवेदनाओं के बारे में जाने। समानुभूति वह क्षमता है जिसमें सामने वाले व्यक्ति का जीवन कैसा है यह उपलब्धि हो, और यह संवाद के लिए आवश्यक है। समानुभूति से किशोरों को उन लोगों को स्वीकारने में मदद मिलती है जो उनसे अलग होते हैं। इसके चलते उनका सामाजिक संवाद सुधरता है; केवल साथियों के साथ कक्षा में होनेवाला संवाद ही नहीं, यह जीवन में आगे भी मदद करता है, पारंपरिक या सांस्कृतिक विविधतापूर्ण परिस्थितियों में।

समीक्षात्मक विचार

एक ऐसी क्षमता है जिससे प्राप्त जानकारी और अनुभवों का निष्पक्ष तरीके से आकलन किया जा सकता है। समीक्षात्मक विचारों से किशोरावस्था में किसी भी ऐसे कारक को पहचानकर उसका आकलन किया जा सकता है जिसका प्रभाव स्वभाव और नज़रिये पर हो रहा हो, जैसे सिद्धांत, साथियों का दबाव और मीडिया।

सृजनात्मक विचार

एक नावीन्यपूर्ण तरीका है जिसमें वस्तुओं के चार प्रमुख घटक देखे जाते हैं – प्रवाह (नवीन विचारों का जन्म), लोचनीयता (आसानी से बदलाव स्वीकारना), वास्तविकता (कुछ नवीन निर्मिति), और अभिव्यक्ति (दूसरे विचारों पर निर्माण)।

निर्णय क्षमता

एक कौशल है जो किशोरों के जीवन से संबंधित निर्णयों को सकारात्मक रुप से प्रभावित करता है। युवा उनके लिए उपलब्ध विभिन्न विकल्पों का आकलन करना सीखते हैं, और अपने विभिन्न फैसलों के प्रभाव पर विचार कर पाते हैं।

समस्या समाधान

से किशोरावस्था के दौरान किसी भी समस्या को उसके विविध कोणों से देखते हुए उसके समाधानों के अलग अलग आयाम मिलते हैं, और यह उपलब्ध विकल्पों व उनके प्रभावों के सकारात्मक या नकारात्मक स्वरुप को जाँचने में सहायक होता है।

अन्तर्वैयक्तिक संबंध कौशल

किशोरों को उन लोगों को सकारात्मक तरीके से संबोधित करने में मदद करता है जो उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होते हैं। यह मित्रों और परिवार के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने और बनाए रखने में समर्थ बनाता है।

प्रभावी संवाद

का अर्थ है किशोरों को अपनी भावनाएं अभिव्यक्त कर पाने में मदद करना, जो कि शाब्दिक और गैर शाब्दिक दोनो होता है और जो संस्कृतियों और स्थितियों के संदर्भ में उपयुक्त हो। इसका अर्थ है अपने विचारों, इच्छाओं, जरुरतों और डर को अभिव्यक्त कर पाना, और साथ ही, आवश्यकता के समय सलाह और मदद प्राप्त की क्षमता।

तनाव प्रबन्धन

ऐसा जीवन कौशल है जिससे जीवन में तनाव के स्रोत को पहचानना, जीवन पर इसके प्रभाव का आकलन करना, और तनाव के स्तर का नियंत्रण करना शामिल है; स्थिति से मुकाबला करने के सकारात्मक शैली को सीखना और निष्क्रिय प्रबन्धन तंत्र को सक्रिय प्रबन्धन तंत्र से बदलना – जिसमें उनकी जीवन शैली या आस पास का वातावरण को बदलना और शांत होना सीखना शामिल है।

संवेदनाओं के प्रबन्धन

में शामिल है अपने अंदर और दूसरों में संवेदनाओं की पहचान करना; यह जानना कि संवेदनाएं कैसे किसी व्यवहार को प्रभावित करती हैं, साथ ही संवेदनाओं के अनुरुप प्रतिक्रियात्मक व्यवहार किस तरह से किया जाता है। इस कौशल का महत्वपूर्ण हिस्सा है गुस्सा या अवसाद जैसे उन तीव्र भावनाओं का प्रबंधन सीखना जिनपर गलत प्रतिक्रिया करने से उनका नकारात्मक प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर असर करता है।

डॉ गरिमा श्रीवास्तव दिल्ली की नैदानिक मनोचिकित्सक हैं जिन्होंने ऑल इन्डिया इन्स्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सायन्सेस से पीएचडी प्राप्त की है।

इस आलेख की सर्वप्रथम रचना और प्रकाशना व्हाइट स्वान फाउंडेशन द्वारा की गई थी, और इसे द लिव लव लॉफ फाउंडेशन के लिए संपादित किया गया है।

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